पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- विगत एक दशक में भारत ने कल्याण-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर उत्पादकता, सततता एवं तकनीकी आधुनिकीकरण पर आधारित किसान-केंद्रित मॉडल को अपनाया है, जिसने एक सुदृढ़ एवं विविधीकृत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को प्रोत्साहित किया है।
भारत में कृषि क्षेत्र
- कार्यबल में भागीदारी: कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ भारत के कुल कार्यबल के लगभग 46.1% लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं।
- आजीविका का आधार: यह क्षेत्र देश की लगभग 55% जनसंख्या की आजीविका का आधार बना हुआ है तथा ग्रामीण आय सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- आर्थिक योगदान: कृषि क्षेत्र भारत के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में लगभग एक-पाँचवाँ (19-20%) योगदान देता है।
- वृद्धि दर: वित्त वर्ष 2024-25 में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों ने 4.6% की वृद्धि दर (वास्तविक GVA वृद्धि) दर्ज की, जिसमें पशुपालन एवं मत्स्य पालन क्षेत्रों का प्रमुख योगदान रहा।
भारत के कृषि परिवर्तन की प्रमुख उपलब्धियाँ
- कृषि उत्पादन एवं आर्थिक योगदान: कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन (GVA) वर्ष 2014-15 के 20.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 48.7 लाख करोड़ रुपये हो गया।
- वर्ष 2024-25 में खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर 357.73 मिलियन टन हो गया।
- सार्वजनिक निवेश में वृद्धि: कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के लिए बजटीय आवंटन बढ़ाकर वित्त वर्ष 2026-27 में 1,40,528.78 करोड़ रुपये कर दिया गया।
- कृषि निर्यात में वृद्धि: वित्त वर्ष 2024-25 में कृषि निर्यात बढ़कर 51.1 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़कर 20.4% हो गई है, जो मूल्य संवर्धन आधारित विकास का संकेत है।

कृषि क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- जल संकट एवं सिंचाई: भारत की कृषि अत्यधिक रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, जिससे यह सूखे एवं अनियमित वर्षा के प्रति संवेदनशील बनी रहती है।
- विशेष रूप से सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं एवं जल प्रबंधन तक पहुँच एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
- ऋण एवं वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुँच: लघु एवं सीमांत किसानों को प्रायः ऋण और अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुँच प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- छोटी एवं खंडित भूमि जोतें: अधिकांश किसान छोटे भू-स्वामी हैं, जिसके कारण कृषि जोतें खंडित एवं आर्थिक रूप से अलाभकारी हो जाती हैं।
- इससे आधुनिक कृषि तकनीकों एवं उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाना कठिन हो जाता है, परिणामस्वरूप उत्पादकता कम बनी रहती है।
- पारंपरिक एवं प्राचीन कृषि पद्धतियाँ: भारतीय किसानों का एक बड़ा वर्ग अभी भी पारंपरिक एवं प्राचीन कृषि तकनीकों पर निर्भर है।
- बाजार अस्थिरता एवं मूल्य उतार-चढ़ाव: प्रभावी बाजार संपर्क, मूल्य संबंधी जानकारी तथा मध्यस्थों पर निर्भरता के कारण किसानों को प्रायः मूल्य अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
- मृदा क्षरण: भारत की लगभग 30% भूमि मृदा क्षरण से प्रभावित है, जिसका प्रमुख कारण रासायनिक उर्वरकों एवं कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग है।
- यूरिया एवं कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग तथा जैविक पदार्थों में कमी के कारण पोषक तत्वों का असंतुलन उत्पन्न हुआ है, जिससे मृदा उर्वरता एवं पारिस्थितिकीय सेवाएँ प्रभावित हो रही हैं।
- बढ़ती कृषि लागत: हरित क्रांति मॉडल अब घटते प्रतिफल की स्थिति में पहुँच चुका है।
- उत्पादन लागत में वृद्धि लाभ की तुलना में अधिक तीव्रता से हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की ऋणग्रस्तता एवं आत्महत्या जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा एवं चरम मौसमी घटनाएँ कृषि उत्पादकता तथा खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रही हैं।
कृषि विकास हेतु प्रमुख पहलें

कल्याण-केंद्रित मॉडल से किसान-केंद्रित मॉडल की ओर परिवर्तन
- सब्सिडी-आधारित सहायता से आय सुरक्षा की ओर: पूर्व की नीतियाँ मुख्यतः उर्वरक, बिजली, सिंचाई एवं खाद्यान्न खरीद पर आधारित अनुदानों पर केंद्रित थीं।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) द्वारा किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान की गई, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता बढ़ी तथा रिसाव में कमी आई।
- राहत उपायों से जोखिम प्रबंधन की ओर: पूर्व में फसल क्षति के बाद मुआवजा प्रदान करने पर अधिक बल दिया जाता था।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) एवं मौसम आधारित सलाहकारी सेवाओं जैसी पहलों ने पूर्व-सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण एवं जलवायु अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ किया है।
- लाभार्थी से हितधारक के रूप में पहचान: पूर्व की नीतियाँ किसानों को मुख्यतः सरकारी सहायता प्राप्त करने वाले लाभार्थियों के रूप में देखती थीं।
- वर्तमान सुधारों में किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, उद्यमिता तथा मूल्य शृंखलाओं में भागीदारी के माध्यम से किसान सशक्तिकरण पर बल दिया गया है।
- उत्पादन-केंद्रित नीतियों से आय-केंद्रित नीतियों की ओर: पूर्व की रणनीतियाँ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु खाद्यान्न उत्पादन को अधिकतम करने पर केंद्रित थीं।
- हालिया नीतियाँ किसानों की आय दोगुनी करने, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन तथा मूल्य संवर्धन जैसे क्षेत्रों में विविधीकरण को प्रोत्साहित कर रही हैं।
आगे की राह
- कृषि विविधीकरण को प्रोत्साहन: कृषि को केवल खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय बागवानी, डेयरी, पशुपालन, मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन , मधुमक्खी पालन तथा कृषि वानिकी की ओर स्थानांतरित करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और कुछ सीमित फसलों पर निर्भरता कम होगी।
- सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का विस्तार: जल उपयोग दक्षता बढ़ाने हेतु ड्रिप एवं स्प्रिंकलर आधारित सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए।
- किसान संगठनों का सुदृढ़ीकरण: किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों एवं स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को मजबूत बनाकर सामूहिक विपणन, सौदेबाजी क्षमता, ऋण उपलब्धता एवं बाजार संपर्क को बढ़ाया जाना चाहिए।
- कृषि प्रसंस्करण एवं भंडारण अवसंरचना का विकास: खाद्य प्रसंस्करण, शीत-शृंखला, गोदामों एवं लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का विस्तार कर फसलोत्तर हानियों को कम किया जाना चाहिए तथा उपभोक्ता मूल्य में किसानों की हिस्सेदारी बढ़ाई जानी चाहिए।
- कृषि-प्रौद्योगिकी एवं नवाचार को प्रोत्साहन: स्टार्टअप्स, कृषि-प्रौद्योगिकी नवाचारों एवं डेटा-आधारित कृषि समाधानों को बढ़ावा देकर उत्पादकता, दक्षता और बाजार तक पहुँच में सुधार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत का कृषि परिवर्तन अब केवल उत्पादकता वृद्धि तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक प्रतिस्पर्धी, जलवायु-अनुकूल, प्रौद्योगिकी-संचालित एवं सतत कृषि-खाद्य प्रणाली के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
- ऐसी व्यवस्था किसानों की आय में वृद्धि, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय सततता एवं ग्रामीण समृद्धि सुनिश्चित करेगी तथा वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” के लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
स्रोत: PIB